बरसात

देख हवा सर्द, और ठंडी रात है
मौसम का अब क्या कहूँ, क्या बात हैं
जाने क्यूँ दिल मे है बेचैनी, क्यूँ आंखों में नमी हैं
लगता है शहर में उसके, हुई बरसात है

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तू भी मेरे नाम कोई शाम तो दे।

मोहब्बत को मेरी यूँ मौत का नाम न दे,
सीने से निकाल के दिया है, इसे कोई अंजाम तो दे,
न कर फिक्र , फिर चाहे जैसा हो परिणाम
मैं तेरे लिए काली अमावस्या ही सही
तू भी मेरे नाम कोई शाम तो दे।

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मेरी प्यारी दी

कैसे कहूँ दीदी के तू कितनी खास हैं
खुशी या गम हर पल तू मेरे पास है
जब कभी खुद को अकेला पाया
तुम आयी बनकर मेरा हमसाया
जब जब रोया मैं, तुझको साथ पाया
कभी बनकर माँ, मुझे जीना सिखाया
मेरी छोटी छोटी बातों को समझना
और प्यार से फिर मुझे समझाना
कभी मायूसियों में बनके एक किरण तेरा आना
हाँ तुम्ही ने तो सिखाया इस लड्डू को गम में मुस्कुराना।

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आये रब्बा इस दिल को तू समझा ले


आये रब्बा इस दिल को तू समझा ले
टूटा पड़ा फिर भी बात ना एक ये मानै
सोचता रैवे पल पल ये हर पल
चैन क्या होवै, क्यूँ ये कमबख्त न जानै
आये रब्बा इस दिल को तू समझा ले

जख्म वो सख्त अभी सूखा भी नही
क्यूँ गम इक नया ये पालै
सुनता जो नही है मेरी ये बातें
रब्बा! अब तू ही इसे मनालै
आये रब्बा इस दिल को तू समझा ले।

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अक्सर सोचता हूँ…

अक्सर सोचता हूँ या फिर यूँ कहो
हर पल यही सोचता हूँ
के तुम थी तो कैसा था
तुम अब नही हो तो कैसा है
वो गुलाब सी महकती तेरी मुस्कान
जिसका मैं दीवाना था कभी
आज जैसे फीका सा लगे सब
वो जो हर रोज़ निकल पड़ते थे हम
उन हसीं खवाबो की सैर में
जिसे हम दोनों ही जिया करते थे
उन हर एक वादों को ताक पे रख के
जो आड़े आते गए
वादे जो तुझे मुझसे दूर करते थे
हाँ.. मैं उसी दुनिया के बारे में सोचता हूँ
वो जो हम दोनों ने मिलके बनाई थी
पर आज..तुम नही हो वहां
रह गया हूं तो सिर्फ मैं अकेला तन्हा
वो “हम” जैसे अर्थहीन से हो गया
उन डरावने खयालो और यादों में
कैद होकर जो हो गया
जो अनायास ही डराने को
बहुत मज़बूर करते हैं अब
और इसी कश्मकश में जैसे
मैं खुद को ही भूल गया
और वज़ूद..जैसे खुद ही ढूंढ रहा
पहचान अपनी…..

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