मेरी प्यारी दी

कैसे कहूँ दीदी के तू कितनी खास हैं
खुशी या गम हर पल तू मेरे पास है
जब कभी खुद को अकेला पाया
तुम आयी बनकर मेरा हमसाया
जब जब रोया मैं, तुझको साथ पाया
कभी बनकर माँ, मुझे जीना सिखाया
मेरी छोटी छोटी बातों को समझना
और प्यार से फिर मुझे समझाना
कभी मायूसियों में बनके एक किरण तेरा आना
हाँ तुम्ही ने तो सिखाया इस लड्डू को गम में मुस्कुराना।

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आये रब्बा इस दिल को तू समझा ले


आये रब्बा इस दिल को तू समझा ले
टूटा पड़ा फिर भी बात ना एक ये मानै
सोचता रैवे पल पल ये हर पल
चैन क्या होवै, क्यूँ ये कमबख्त न जानै
आये रब्बा इस दिल को तू समझा ले

जख्म वो सख्त अभी सूखा भी नही
क्यूँ गम इक नया ये पालै
सुनता जो नही है मेरी ये बातें
रब्बा! अब तू ही इसे मनालै
आये रब्बा इस दिल को तू समझा ले।

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आ चल चले उस ओर

सुनो… आ चल चले उस ओर
जहाँ कभी ना गया कोई और
जहाँ सिर्फ बादलों का हो शोर
जहाँ रास्तें हो बिन मोड़,

जहाँ बारिश भी होगी तेरी सहेली
जैसे मेंडक की टर टर में छुपी कोई पहेली
जहाँ आंख मूँदे हम पड़े होंगे ऐसे
जहाँ की न हमको कोई खबर होगी।

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तेरे होने से ही मैं हूँ माँ

तेरे होने से ही मैं हूँ माँ
बिन तेरे मैं कुछ भी तो नही
तेरी आँखों का तारा मैं बेशक
मेरे बिन तू भी अधूरी कही

अच्छे से याद है
मुझे वो तेरी हर इक बात
राजाओं की कहानी
कहानी में वो कायनात
वो गीले पैरो से
फर्श पर चलना
जब-जब घर मे
होती थी बरसात
और वो तेरा गुस्से में
ज़ोर से चिल्लाना मुझपे
पर जैसे गुस्से में छिपे हो
वहीं नन्हे ज़ज़्बात।

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माँ


ये उम्र है जो दिन ब दिन खत्म होती जा रही है,
पर फिर भी कोने में वो उम्मीद नज़र आ रही है
अंधेरे से मुझे कभी कोई बैर नही यद्दपि, पर
जाने क्यों, उस रोशनी की कमी मुझे सता रही हैं?
मेरे अपनो ने मुझे कभी जाना नही
जान कर भी मुझे उन्होंने कभी पहचाना नही
मेरे हृदय की पीड़ा आखिर अब मैं किसे दिखाऊँ
मेरे खून तक ने मुझे जो कभी अपना माना नही
या खुदा ये कैसा तेरा इन्साफ हैं?
इतनी पीड़ा से उसे पैदा किया,क्या यही मेरा पाप हैं?
पर अब कुछ ऐसा कर दे ऐ मेरे मौला
के वो अब वापस लौट आये इसी क्षण
ढलती हुई उमर के इस पड़ाव में
हाथ पकड़ के वो मेरा साथ निभाये
झुकती हुए कमर तो बस एक बहाना हो पर
छोटे बच्चे की तरह अपने कंधे पे मेरा हाथ टिकाये
बस धीरे से वो मुझे “माँ” बोले, ज्यों ही आंखे मेरी भर जाये।

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मैं और मेरी तन्हाई

वो कल धीरे से मेरे करीब आयी और बोली – उदास हो?
मैंने भी हाँ कह दिया, हो भी क्यूँ ना जब वो इतनी खास हो
वो बोली क्यों रहता है तू बेचैन इस कदर, जाने कैसी ये फिक्र हैं?
मैंने कहा कुछ अज़ीज़ लम्हे उधार लिए थे, बस उनके लौट जाने का डर है
वो बोली क्या तुमने खोया, और क्या हैं अब पास में तेरे?
मैंने कहा थोड़े से गमों के बादल और बिछड़ी यादों के अंधेरे?
वो बोली क्यूँ नही लौट जाता वापस, क्यूँ नही बनाता कुछ मीठी यादों के नये डेरे?
मैने कहा ये अब मुश्किल हैं शायद, बहुत पीछे जो छूट गए है अपने मेरे।
वो बोली क्यूँ डूब गए तुम यूँ उसके अंदर, ऐसी हालत की तेरी उसको ज़िक्र तक नही,
मैंने कहा ये ढाई आखर का खेल ही ऐसा है, क्या हुआ गर उसको मेरी फिक्र नही।
वो बोली जीने का मक़सद तो बता “आदित”, मरने की तेरी पास हज़ार वजह,
मैं बोला कौन कमबख़्त यहां मरना चाहता है, उस हमदम को मैं जीता हूँ सब जगह।
वो बोली तू क्यों नही चाहता मुझको, देख हर दम ही तो मैंने तेरा साथ दिया हैं?
मैंने कहा ये तेरी गलतफहमी है, जब जब उसे याद किया,खुद को तेरे अंदर डुबोया हैं।
वो बोली छोड़ दे ये झूठी आस “आदित”, अब लौट कर नही आएगी वो,
मैने कहा थोड़ा सब्र रख तू, कहाँ लिखा है नही आएगी वो
देखना दौड़ कर वापस आएगी, साथ प्यार की सौगात लाएगी वो।

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Intezaar

Intezaar, ye tera Intezaar
Aaj bhi hai mujhko mere yaar
haa intezaar, ye tera Intezaar

Izhaar, wo tera Izhaar
Kiya tha jab tune pahli baar
haa izhaar, wo pahla Izhaar

Ikraar, wo tera Ikraar
yaad hai mujhe har baar
wo ik vaada, nahi bhoola mere yaar
Haa ikraar, wo pahla Ikraar

Mana tere, aashique honge hazaar
Par dil me meri wahi, Jo hoothon pe hai yaar
Pyar agar hai sachha mera, to
Dil tak pahuch hi jayegi meri baat

Intezaar, ye tera Intezaar
Aaj bhi hai mujhko mere yaar
haa intezaar, ye tera Intezaar

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जब वो हँसा था

याद है वो लम्हा, जब वो हँसा था,
बेवजह बेहिसाब, बस हँसा था,
जब ना थी माथे पे कोई शिकन
और ना ही आँखों में संकुचन
जब ना थी कोई दिली पहरेदारी
ना ही कोई सीने में छुपा गम
वक़्त बदला, और बदले लोग भी
बदला वो भी, पर लेके रंज ओ गम
वो अक्सर मिल जाता है मुझे,
भटकता हुआ, इन यादों की गलियों में
अपनी कलम से उड़ेलता है जो
अपने गमों को, किसी सफ़ेद कागज पर।

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क्यों फ़ासले है दरमियाँ

क्यों फ़ासले है दरमियाँ तेरे मेरे
क्यों तुम इसे कम नहीं करती
क्यों दूर जाना चाहती हों ऐसे
क्यों मुझे अब खोने से नहीं डरती
गर खता हुई तो सजा दे मुझको
क्यों तेरी ख़ामोशी कुछ बयां नहीं करती
ना कुछ मैंने पाया, ना तूने कुछ खोया
फिर क्यों ये झील उदासी की, नहीं भरती
तेरे बिन देख, मैं कुछ भी तो नहीं
ना मेरे बिन तू भी, सुकूँ भरती
मेरी हर ख़ुशी तेरी,तेरा हर गम मेरा
तू क्यों अपने गम मुझसे नहीं बांटती….

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सुनो! अब जो गया तो, फिर वापस नहीं आऊंगा मैं

सुनो! अब जो गया तो, फिर वापस नहीं आऊंगा मैं
जितना मर्ज़ी पूकार लेना, दूर कही खो जाऊंगा मैं
बहुत रोयेगा, बेशक इस सच से अनजान है तू आज
पर रश्म ओ रिवाज़ इस दुनिया के यकीनन छोड़ जाऊंगा मैं
सुनो! अब जो गया तो, फिर वापस नहीं आऊंगा मैं।

जो तुम देखोगी खुले आसमान को, लिए आंखों में नमी
तोड़ के खुदको, आंख का तेरे मोती बन जाऊंगा मैं
फिर कभी मिलें शायद ख़्वाबों की सरज़मी पे हम
पर जीते जी रूबरू ना कभी मिल पाउँगा मैं
सुनो! अब जो गया तो, फिर वापस नहीं आऊंगा मैं।

सिरफिरी सी हरकते देख, शायद तुमको हँसी आती होगी
ये दीवानापन है मेरा, इसी से दीवाना कहलाऊंगा मैं
सुनो! अब जो गया तो, फिर वापस नहीं आऊंगा मैं
जितना मर्ज़ी पूकार लेना, दूर कही खो जाऊंगा मैं।

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